१. मुकाम पहला : जागरूकता (Awareness)

गोधूली के समय एक बार एक हरिभक्त ने परम पूज्य गुरुदेव अ. मु. पूज्य श्री नारायणभाई से पूछा था: ‘गुरुजी, धर्मसाधना की प्रथम शर्त क्या हो सकती है?’ गुरुवर्य ने शांति से कहा: ‘स्वस्थ शरीर.... शरीरम् खलु धर्मसाधनम् ।’

‘.....और शरीर को स्वस्थ रखने के लिये.....’ हरिभक्त का प्रश्न पूर्ण होने से पूर्व ही उन्होंने कहा: ‘शरीर स्वस्थ रखने के लिये स्वस्थ मन आवश्यक है। जैसा मन वैसा शरीर और जैसा शरीर वैसा मन। शरीर एवं मन दोनों एक सिक्के के दो पहलु है ।’ कुछ क्षण के विराम के पश्चात गुरुजी हँसते हुए बोले: ‘अब आप पुछोगे कि मन स्वस्थ किस प्रकार रह सकता है? है ना?’

हरिभक्त ने स्मित करते हुए हाँ कहा। पश्चात कुछ गंभीर होते हुए वे बोले: ‘यह ऐसा है कि इसके लिये मन को जानना जरुरी है। यह जानना जागने से ही संभव है। जागना अर्थात् होश में जीना। जिसे अंग्रेजी में To live with awareness कहते है। गीता में इसे साक्षी भाव कहा है। श्रीजीमहाराज़ जानकारी रूप दरवाजे की जो बात कहते है, वह इसी संदर्भ में है। इस प्रकार जागृत रहकर मन को दृष्टिकृत करना सीखें, उसे रुचि या अरुचि से बाँधे नहीं। मन में उठते संकल्प-विकल्प के साथ एक रूप हुए बिना तटस्थ रूप से निरीक्षण करें। जो होता है इसमें मन जो कर्तृत्व का (मैं का अहंभाव)मनोभाव दशिर्त करता है, उसे जागृत रूप से दृष्टिकृत करते रहे, तो मन आपका मित्र बनकर आपके साधनामय जीवन में सहायक होगा ।’

अति महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुभव से यह सम्यक् रूप से समज सकते है कि शरीर सर्व प्रकार से मन के बस में है। बाह्य तकलीफ न हो अथवा कोई अकस्मात या आकस्मिक संयोग के कारण भयंकर छूत न लगे तब तक शरीर गँभीर रूप से बीमार नहीं होता है। कई बार ऐसा देखा गया है कि दृढ़ मनोबल वाले को बाहरी छूत भी असर नहीं करती है। निर्बल मन सर्व प्रकार की बीमारी लाता है। मन की निर्बलता ही महद् अंश से शरीर की प्रतिकारकता (Immunity)को भी समाप्त कर देती है।

मन की एक विशिष्ट आदत है प्रतिक्रिया (Reaction) करना। सुबह उठकर आप क्या करते है?आलस्य मरोडना या जम्हाई लेना। यह मन की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया ही है। जब आप किसी के साथ बात कर रहे हो और मक्खी आपके नाक पर बैठे तो आपका हाथ अपने आप ही मक्खी उडायेगा, यह भी मन की ही प्रतिक्रिया है। कभी कोई अनचाही व्यक्ति राह में मिल जाए और मीठी-मीठी बातें करने लगे तो, मन भूतकाल के खराब अनुभव के आधार पर ही प्रतिक्रिया में ही विचार करने लगेगा, ‘यह तो एक लुच्चा आदमी है। उस वक्त भी उल्लु बना गया था! आज भी अवश्य ही कोई काम होगा, अतएव मीठी-मीठी बातें कर रहा है’ । इस प्रकार मन भूतकाल के अनुभव के आधार पर वर्तमान की प्रत्येक घटना की प्रतिक्रिया करता है।

इस प्रकार हमारा जीवन मन की प्रतिक्रिया से बना है। मन जब प्रतिक्रिया न करें उस समय जो दर्शन होता है वही सत्य है। मन की प्रतिक्रिया ही वस्तु को उसके वास्तविक रूप में हमें दृष्टिकृत नहीं करने देती। मन प्रतिक्रया के कारण किसी वस्तु, घटना या व्यक्ति के बीच पारदर्शक परदा कर देता है, फलस्वरूप हम किसी भी वस्तु, व्यक्ति या घटना को अपने पूर्वग्रह या अनुभव के आधार पर ही समझते है और दृष्टिकृत करते है। परिणाम स्वरूप सत्य से सदैव ही वंचित रहते है।

इक्षांकु वंश में जानश्रुति नामक एक मुमुक्षु राजा हो गये। एक बार उसने उसके गुरु रैकेव से प्रश्न पूछा: ‘प्रभु सब कुछ ईश्वर को अर्पण करने पश्चात भी कर्म के फल रूप पाप पुण्य क्यों लगते है?’ उत्तर में गुरु ने पास पड़ा हुआ पत्थर राजा के सिर पर मारा। राजा ने क्रोधित होकर गुरु को पकड़ कर मारने का हुकम दिया, तब गुरु बोले: ‘राजन्, अगर तुने तेरा सर्वस्व ईश्वर को समर्पित किया है, तो यह पत्त्थर का लगना भी ईश्वरेच्छा से हुआ है, ऐसा मानकर यह समझना चाहिये कि ईश्वर समर्पित इस देह को पत्थर लगे या भाला मारे, मुझे क्या? परंतु नहीं, तुम यह बात भुल गये और तुम्हारे मन ने प्रतिक्रिया कर क्रोध किया। राजन् तुम प्रतिक्रिया में जीते हो, अतएव तुम्हें सभी पाप और पुण्य लगते है। हरेक घटना की जिम्मेदारी संयोग की, भाग्य की या ईश्वर की हो तथापि उस जिम्मेदारी में प्रतिक्रिया कर उसमें हिस्सेदार बन जाते हो ।’

गुरु रैकेव राजा जानश्रुति को अंततः उपदेश देते हुए कहते है: ‘राजन् पाप-पुण्य, सुख-दुःख, सर्जन-प्रलय सब कुछ जिसकी सत्ता से होता है वह तेरे भीतर एवं सर्व जगत में अन्वय रूप से विद्यमान है। उसे पाने के लिये पाप- पुण्य, सुख-दुःख की गिनती नहीं करनी पड़ती, वह तो प्राप्य ही है उसके आसपास उसकी ही सत्ता से घिरा हुआ मन, जिसे तुने अहंकार से तेरा माना है, वह तेरे और परमतत्व के बीच अभिनव प्रतिक्रिया द्वारा तुझे रोके रखता है। तु मन की प्रतिक्रिया से मुक्त होकर जीवन को दृष्टिकृत कर, ऐसा करते हुए हे राजा! तु संसार में रहते हुए भी प्रभु प्राप्ति कर सकेगा।

अगर हरेक इन्द्रियों की प्रत्येक क्रिया को जागरुक होकर निहारे तो मन की यह प्रतिक्रिया करने की आदत छूट जाती है। मनको शांति से विराम करने के लिये किसी आसन की आवश्यकता है; मन जब भी किसी पदार्थ या व्यक्ति में लीन होता है, तब कुछ समय के लिये उसे शांति प्राप्त होती है, परंतु दुन्यवी पदार्थ या व्यक्ति में मिलती यह शांति अति क्षणिक होती है। अतः अगर मन को सच्ची शाश्वत शांति प्रदान करनी हो तो उसे श्री हरि के चरणों में ही आसन दें। प्रभु की दिव्यमूर्ति में लीन होने से जो शांति, जो आनंद प्राप्त होगा, वह चिरकालीन एवं अलौकिक होगा।