२. मुकाम द्वितीय : मन क्या है?

गहन चिंतन करने से यह ज्ञात होता है कि मन का घनी भूत स्वरूप (Solidified form) यानि स्थूल शरीर, मन का क्रियात्मक शरीर यानि कर्म एवं मन का वायुमय शरीर स्वरूप यानि प्राण। स्वामी विवेकानंद भी इस बात का समर्थन करते हुए ‘राजयोग’ में लिखते है: ‘शरीर तो मन की मात्र बाहरी सतह है। ये दोनों अलग-अलग वस्तु नहीं है,जिस प्रकार कालु मछली एवं उसकी सीप होती है, उसी प्रकार मन पर शरीर है, दोनों एक ही वस्तु के दो पहलु है .कालु मछली का भीतरी पदार्थ बाहर से जड़ तत्व को लेता है और सीप बनाता है, उसी प्रकार भीतर के सूक्ष्म बल जिसे मन कहते है, बाहर से स्थूल द्रव्यों को लेकर उनमें से इस बाह्य शरीर रूप सीप तैयार करता है।

मन स्वयं के प्राणमय स्वरूप द्वारा हमारे स्थूल शरीर में वायु को गति देता है, फेफड़े को क्रियाशील रखता है, आँखों का खोलना-बंद करना करता है, अन्न को पचाता है, रक्त को गति प्रदान करता है, कोषों को नवजीवन देता है एवं ऐसे अनेक कार्य करता है। शरीर के पाचक रस, रक्त, शुक्र, पसीना, पित्त, कफ आदि मन के ही जलमय स्वरूप है। मन भयभीत होता है तब पसीना आता है और मन आनंद में हो तो शरीर में रस बनते है। मन वासना के आवेग में आये तो शुक्र या रज की उत्पत्ति होती है। क्रोध के समय में मन कफ की वृध्दि करता है, तो उद्वेग के समय में पित्त की वृद्धि करता है। इस प्रकार मन के सभी व्यापार मन के आघीन है।

अगर आप जागरुकता पूर्वक दृष्टिगोचर करेंगे तो यह ज्ञात होगा कि हमारी प्रत्येक इंद्रिय तथा प्रत्येक संवेदन के पीछे मन विद्यमान है। भगवान श्री स्वामिनारायण निज अध्यात्मशास्त्र वचनामृत में कहते है: ‘पंद्रह तत्व का (पंचमहाभुत, पंचज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय) स्थूल शरीर है, परंतु जब उसमें नौ तत्व की (मन,बुद्धि, चित्त, अहंकार तथा पंचविषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गंध ),सूक्ष्म देह सम्मिलित हो तब विषय का यथार्थ ज्ञान होता है, इसके बिना नहीं होता है .......स्थूल देह को श्रोत्र इंद्रिय है उसके द्वारा बात सुनता है, अगर मन अन्य स्थान की ओर हो तो वह बात समज में नहीं आती है इस प्रकार दसों इंद्रिय u में मन वर्तित हो तो ही वे इंद्रियाँ निज विषय को ग्रहण करने में समर्थ हो, परंतु अगर मन न वर्तित हो तो कोई भी इंद्रिय निज विषय को ग्रहण करने में समर्थ नहीं होती है ।’ (साळंगपुर-14 वाँ वचनामृत)

कई बार आँखे खुली होने के बावजुद हमें आँखो के सामने के दृश्य का अधिक ज्ञान नहीं होता है, क्योंकि उस समय हमारा मन किसी दूसरी कल्पना या विचार में मग्न रहता है। आँखों से देखने के लिये आँखो के गोलक में मन की सक्रियता अत्यंत आवश्यक है। हमारी आँखों के सामने जब कोई दृश्य, वस्तु या व्यक्ति आती है, तब नेत्रपटल (Retina) पर उसका प्रतिबिंब पड़ते ही ज्ञानतंतु द्वारा दिमाग के दर्शन केन्द्र में उसके संवेदन पहुँचते है, वहाँ से वे संवेदन मन के पास भेजे जाते है। मन उन संवेदनों को निश्चयात्मिका वृत्ति रूप बुद्धि की समक्ष प्रस्तुत करता है। बुद्धि उसकी प्रतिक्रिया करती है। इस प्रतिक्रिया के साथ ही ‘मैं’ की भावना स्फुरित होती है। तत्पश्चात इस क्रिया एवं प्रतिक्रिया का संमिश्रण आत्मा की समक्ष प्रस्तुत होता है। आत्मा जब मिश्रण को दृश्य के रूप में दृष्टिकृत करती है, तब उसे हम दर्शनानुभूति कहते है। यह समग्र घटना क्षणो में रचित होती है और हम साक्षीभाव भूल कर मन के साथ एकरूपता अनुभव करते होने की वज़ह से मन की प्रतिक्रियात्मक वृत्ति से होते दर्शन को समझ नहीं सकते है।

अज्ञान वेष्टित आत्मा को धर्म शास्त्र में जीव के तौर पर पहचाना जाता है। मन एवं जीव दोनों परस्पर मित्र है।भगवान स्वामिनारायण ने इन दोनों की मित्रता की तुलना दूध एवं पानी की मित्रता से की है। दूध और पानी को मिश्रित कर गर्म किया जाए तो पतीली में पानी नीचे बैठकर दूधको जलने से बचाता है। उसी प्रकार अधिक गर्म होने से दूध उफान लाकर अग्नि को बुज़ा कर पानी को जलने से बचाता है। (ग.अं.6ठ्ठा वचनामृत) जो बात जीव को पसंद न हो उसका मन में कभी संकल्प भी नहीं होता है। इस प्रकार जीव और मन का एकात्मभाव भली भाँति सिध्ध् करते हुए श्रीजीमहाराज़ (ग.म.23वे) वचनामृत में कहते है: ‘आज हमने मन के रूप का विचार किया परंतु मन जीव से भिन्न दृष्टिकृत नहीं हुआ, मन तो जीव की ही कोई किरण है, परंतु जीव से भिन्न नहीं है ।’

मन द्वारा आत्मा ही अभिव्यक्त होने के कारण श्रीजीमहाराज़ ने मन को जीव की कोई किरण कहा है, इसके द्वारा मन की जीव के साथ तादात्म्यता दिखाई है। अतएव उपनिषद कहते है कि ‘मन एक महान देव है ऐसा समझ कर उसकी पूजा करें ।’ वृत्ति के बिना मन आत्मा के साथ एक रस हो जाता है।

श्वेताश्वतर उपनिषद में एक अति सुंदर श्लोक आता है। जिसमें कहा गया है: ‘सुंदर पंख वाले पक्षी की जोड़ी एक वृक्ष की ड़ाल पर बैठी है, जिसमें एक पक्षी फल खा रहा है, जबकि दूसरा फल न खाते हुए, उसे देख रहा है ।’ अति सुंदर रूपक है। कौन है ये पक्षी?जो फल खा रहा है वह मन सहित अहंकार है यानि आप स्वयं हो, जो फल नहीं खा रहा है वह आपकी सहज आत्मस्थिति है। मन को जो इस प्रकार पहचानता है, वह सहज हो सकता है एवं वही परमात्मा को पा सकता है!!