३. मुकाम तृतीय :मन की उत्पत्ति
श्री योगवासिष्ठ महारामायण में (5/91) भगवान श्री रामचंद्र महर्षि वसिष्ठ से एक अतिशय मार्मिक सवाल किया है। श्रीराम पूछते है: ‘गुरुदेव, इस शरीर की उत्पत्ति का कारण क्या है? एवं प्रभु, कृपा कर यह भी बतायें कि शरीर की उत्पत्ति के कारण का कारण क्या है?’ महामुनि वसिष्ठकहते है, ‘राम, इस स्थूल शरीर का बीज यानि कि उत्पत्ति का मूलभूत कारण चित्त अर्थात् मन है। वत्स! तुम्हे संशय होगा कि चित्त से शरीर किस प्रकार उद्भवित् हो सकता है?परंतु ऐसा शक निरर्थक है, क्योंकि स्वप्नावस्था में चित्त से हमारे शरीर का उदय हम सभी अनुभव कर सकते है। हे राम! जिस प्रकार मटकी तथा गमला आदि मिट्टि का ही विशाल रूप है। उसी प्रकार यह दबदबा भरा जगत दृष्टिकृत होता है वह भी चित्त का ही विशाल रूप है। वत्स, अब इस चित्त की उत्पत्ति का कारण क्या है उसे सुनो, अनेक जन्मों के संचित कर्म के परिपाक रूप से अज्ञानमय दृढ़ वासना की सतह आत्मा से चिपकती है, जिसे कारण शरीर कहा जाता है। यह कारण शरीर वासना मय है, अज्ञान रूप है,अविद्यात्मक है, अतः उसे ही माया अथवा प्रकृति कहते है। जब जीव देह धारण करता है, तब वासना एवं प्राण की गति उभय प्रवृत होने से उसमें से चित्त जन्मता है! हे राम! एक प्राण की गति और दूसरी दृढ़ वासना ये दोंनो चित्त की उत्पत्ति के कारण है। उनमें से एक के क्षीण होने से दोनों क्षीण हो जाते है। सिर्फ प्राण की गति या सिर्फ वासना चित्त को जन्म दे नहीं सकती। जिस प्रकार तिल में तेल है, उसी प्रकार प्राण की गति वासना में एवं वासना प्राण की गति में स्थित है। जिस प्रकार बीज से अंकुर निकलता है और अंकुर से बीज होता है, उसी प्रकार वासना एवं प्राण की गति से चित्त और चित्त से वासना तथा प्राण की गति, यह क्रम चलते रहता है ।’
इस समग्र हकीकत को संक्षिप्त में समझना हो तो यह कह सकते है कि वासना स्वयं ही उछल कर आत्मा में क्षोभ कर प्राण की गति को जागृत करती है, फलस्वरूप चित्त रूप बालक की उत्पति होती है। जब प्राण स्वयं गति कर आत्मा में क्षोभ कर कारण शरीरमय रागादि वासना को प्रेरित करता है और परिणाम स्वरूप चित्त रूप बालक अवतरित होता है। अतएव मुंडक उपनिषद भी कहता है कि ‘एतस्माज्जायते प्राणो, मनः सर्वेन्द्रियाणि च’ (2-1-3) अर्थात् मन आत्मतत्त्व में से प्राण के साथ ही स्फूरित होता है और समग्र शरीर में व्याप्त होकर रहता है।
मन की उत्पत्ति के इतिहास की अगर शोध करें तो उसके मूल हमें ब्रह्मांड की उत्पत्ति के इतिहास की ओर ले जाते है। भगवान स्वामिनारायण ने (ग.म.12 वे )वचनामृत में इसके बारे में अति स्पष्ट बात कही है। परात्पर परब्रह्म परमात्मा सृष्टि की उत्पत्ति के हेतु मूल अक्षर की समक्ष प्रेरक दृष्टि करते है, तब मूलअक्षर सृष्टि की उत्पत्ति का संकल्प कर मूलपुरुष को प्रेरणा देते है। मूलपुरुष महामाया रूप मूलप्रकृति के साथ संलग्न होती है, परिणाम स्वरूप प्रकृति द्वारा अनंत कोटि प्रधान (निम्नप्रकृति) और पुरुष रूप हरिण्मय गर्भ का जन्म होता है। तत्पश्चात प्रत्येक प्रधान पुरुष युग्म में से महतत्त्व एवं चित्त उत्पन्न होता है . महतत्त्व में सूक्ष्म रूप से समग्र जगत विद्यमान है। महतत्त्व निर्विकार, प्रकाशमान, स्वच्छ और शुद्ध सत्त्वमय है। महतत्त्व में से जन्मे सात्त्विक अहंकार में से मन तथा इन्द्रियों के देवता उत्पन्न होते है। राजस अहंकार में से दस इन्द्रियाँ, बुद्धि तथा प्राण उत्पन्न होते है, तामस अहंकार में से पंचभूत तथा पंच तन्मात्रा का जन्म होता है। सात्विक अहंकार में से जन्मा हुआ मन स्त्री आदि पदार्थ की समग्र कामना की उत्पति क्षेत्र है तथा संकल्प -विकल्प रूप है तथा समस्त इन्द्रियों का नियंता है। भगवान कपिल मुनि रचित सांख्य दर्शन मन की उत्पत्ति के उपर्युक्त उपक्रम को समर्थन देता है। सांख्य दर्शन यह दावा करता है बुद्धि से लेकर पत्थर के टुकड़े तक के सभी पदार्थ एक ही पदार्थ में से बने है। उनमें जो फर्क है उनकी सूक्ष्मता या स्थूलता के कारण है। सुक्ष्म अवस्था कारण है तथा स्थूल अवस्था कार्य है।
हमारा योगशास्त्र संपूर्ण रूप से सांख्य दर्शन पर आधारित है। सांख्य एवं योग के समन्वय द्वारा ही हम अपने मन की उत्पत्ति की घटना को सम्यक् रूप से समझ सकते है। हमारे योगशास्त्र समझाते है कि प्राणशक्ति पाँच स्वरूप धारण कर हमारे शरीर का पोषण करती है। प्राण, व्यान, अपान, समान एवं उदान। इन पाँचो में से जो समान है वह शरीर के रोम-रोम में व्याप्त है और उसकी मदद से ही मन क्रियाशील होता है। सारे शरीर में संचार कर हमारी पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा पाँच कर्मेन्द्रिय द्वारा बाह्य जगत का अनुभव करवाता है।
उपनिषद एक अत्यंत चिंतनीय रूपक है। इस शरीर रूप जगत में जठर रूप वेदी है, उसमें जठराग्नि रूप अग्नि में अन्न रूप समिध द्वारा प्राण रूप देव को आहुति दी जाती है। इसीलिये वैदिक संस्कारानुसार भोजन के समय पाँचो प्राणों को अनुक्रम से प्राणाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, समानाय स्वाहा और अंततः उदानाय स्वाहा इस प्रकार बोलकर ग्रास लिये जाते है। छांदोग्य उपनिषद में लिखा है कि इस प्रकार अन्न द्वारा प्राण को आहुति देने से प्राण तृप्त होते है।
यहाँ जिस प्राण का उल्लेख किया गया है, उसका अर्थ अति व्यापक है। प्राण का अर्थ केवल श्वास ही नहीं,अपितु श्वास जिसे गति प्रदान करता है, श्वास की चेतना शक्ति है, वह प्राण है। प्राण एवं मन का अति गाढ संबंध है। जब प्राण का संचार होता है, तब मन चिंतन करता है तथा मन जब संकल्प करता है, चिंतन करता है और इस प्रकार सक्रिय होता है, तब प्राण का विस्तार होता है। प्राण का अतिरिक्त भंडार दिमाग एवं नाड़ी केन्द्र में होता है। अगर हम प्राण का नियंत्रण कर सके तो दुनिया की हरेक शक्ति का नियंत्रण अपने आप हो सकता है। इस जगत में जो प्राण बल है, वह हमारी श्वास द्वारा हमारे प्राण प्रवाह के साथ संलग्न है। हम श्वास के साथ संकल्प का समन्वय करें तो ब्रह्मांड का अगाध प्राण बल हमारा हो सकता है। वेग, गुरुत्वाकर्षण, विद्युत आदि रूप में प्राण ही अभिव्यक्त होता है।
अष्टांग योग में प्राणायाम के माध्यम से प्राण के निरोध द्वारा मन का निरोध किया जाता है, परंतु ध्यान द्वारा चित्त का निरोध किस प्रकार से होता है यह समझाते हुए भगवान स्वामिनारायण (ग. प्र. 25 में) वचनामृत में कहते है: ‘प्राणायाम के द्वारा प्राण का निरोध होता है, उसके साथ ही चित्त का निरोध होता है, उसी प्रकार चित्त के निरोध द्वारा प्राण का निरोध होता है। चित्त का निरोध कब होता है? जब सभी स्थान से वृत्ति टूटकर एक भगवान में संलग्न होती है, भगवान में वृत्ति संलग्न तब होती है, जब सभी स्थान से वासना टूटकर एक भगवान के स्वरूप की वासना होती है .......तब उसका चित्त भगवान के स्वरूप में संलग्न होता है, उस चित्त के निरोध के द्वारा प्राण का निरोध होता है.......अतः जिस भक्त की चित्त वृत्ति भगवान के स्वरूप में संलग्न हो, उसे अष्टांगयोग बिना साधे ही प्राप्त हो गया है ।’
मन की उत्पत्ति की विशद् चर्चा को संक्षिप्त में सारांश कहे तो यह कह सकते है कि जीवात्मा ने जन्मांतर में संचित किये हुए कर्म रूप वासना और प्राण, उभय के संयोजन से मन निपजता है। यह अति सूक्ष्म आकाश तत्त्व का बना हुआ है। हमारे ऋषिमुनिओं ने काव्यात्मक परिभाषा में यह कहा है, ‘पुरुष और प्रकृति के संयोग से चित्त जन्मता है ।’ पुरुष यानि आत्मा तथा प्रकृति यानि माया, अविद्या, अज्ञान, वासना प्रकृति के अति सूक्ष्म अंश में से चित्त का शरीर तथा पुरुष की अति सूक्ष्म शक्ति में चित्त की शक्ति का जन्म होता है!