१०. अहिंसा का बोध
सहजानंदजी ने शास्त्रों के वचनों द्वारा अहिंसामय यज्ञ का प्रतिपादन किया। शास्त्र में ‘अजेन यजेत।’ ऐसा जो कहा है उसका अर्थ यह नहीं कि यज्ञ में बकरे की हिंसा की जाए। ‘अज’ अर्थात् पुराना धान, उसका यज्ञ में उपयोग करना यह सही अर्थ समजाकर यज्ञ में होती पशुहिंसा रोककर अहिंसक ब्रह्मयज्ञों का आरंभ करवाकर जीवों को आत्मा-परमात्मा का संबंध कराया।
धर्मकार्य में हिंसा हो ही नहीं सकती; इतना ही नहीं परंतु समाज की हरेक प्रवृत्ति में हिंसा का आश्रय लेना यह अधर्म है ऐसा साबितकर सहजानंदजीने जगत को अहिंसा का सर्वोत्तम मार्ग दर्शाया।
उस समय के मुंबई के गवर्नर सर जॉन माल्कम के संग वार्तालापकर गौवधबंधी कराई तथा जानवरों की रक्षा की।