१२. भेदभाव के गलत ख्यालों का त्याग

हिंदु धर्म में, हिंदु के अलावा अन्य जाति जैसे-पारसी, मुसलमान, खोजा, जैन, इसाई आदि को सम्मिलित करने में स्वामिनारायण का अनन्य योगदान है। ‘आत्मा को जाति, वर्ण या आश्रम नहीं होता। भगवान के यहाँ एसा कोई भेद ही नहीं है। वहाँ तो सब की एक ही जाति है। सत्वगुण में तथा सत्कर्मों में जो स्थिर हो उसकी जाति उँचे से उँची है,’ ऐसा समझाकर कौमभेद, जातिभेद, रंगभेद तथा धर्मभेद के गलत विचारों को दूरकर उन्होंने भावात्मक एकता स्थापित कर लोगों में भाईचारे के भाव को बढाकर आत्मियता पैदा की।