२४. धर्मधुरा की सुपुर्दगी

श्री स्वामिनारायण ने समग्र विश्व का आत्यंतिक कल्याण सदाकाल सिद्ध होता रहे ऐसी सर्वांग संपूर्ण संस्था का स्थापन किया। इस संस्था में त्रुटि न आ सके ऐसी संरचना रची। धर्म एवं व्यवहार दोनों को अनुकूल हो ऐसे सुंदर नियम बनायें। उनकी स्थापित उज्जवल धर्म की धूरा संभाल सके ऐसे समर्थ विद्वान एवं चारित्र्यवान आचार्यों को कारोबार की देखभाल एवं धर्म प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने ऐसा आदेश दिया कि वे स्वयं सभी व्यवहार अग्रगण्य त्यागी एवं गृहस्थों की सलाह लेकर करें, किंतु स्वतंत्रता पूर्वक न करें।

इस प्रकार उन्नचास वर्ष की छोटी उम्र में स्वामिनारायण ने स्वयं के इच्छित सर्व कार्य पूर्ण किए।