२२. ललित कलाओं को उत्तेजन
પप्रेमानंदस्वामी ने सहजानंदस्वामी को ‘समस्त कलाओं की खदान’ कहा है। इस प्रकार स्थापत्य की कला, वस्त्र एवं अलंकार की कला, तरह-तरह के भोजन की कला, चित्र तथा मंडप रचने की कला, संगीतकला, लेखनकला इत्यादि कलाओं को उन्होंने बहुत ही प्रोत्साहित किया था। शिल्पकला की दृष्टि से निर्मित सुंदर मंदिर; सहजानंदस्वामी के जीवन चरित्र के हूबहू भाव प्रस्तुत करते प्रासंगिक चित्र, मूर्तियाँ; महान संतकविओं की साहित्यकृतियाँ; शिष्योंने स्वयं बनाकर भेंट के स्वरूप में अर्पण की हुई कारीगिरीवाली वस्तुएँ, वस्त्र, अलंकार, पादूकाएँ, माला, बर्तन, लकडी के बने बैठने के आसन, पर्यंक, गाडियाँ; अन्नकूटोत्सव के समय तैयार किये हुए विविध प्रकार के भोज्य पदार्थ आदि उस समय की विविध कला-कारीगिरी की स्थिति का सुंदर रूप प्रस्तुत करता है।