३. बाल्यकाल
श्री स्वामिनारायण का बचपन का नाम घनश्याम था। आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवित संस्कार ग्रहणकर पिता के पास से अल्पकाल में निज की अलौकिक बुद्धि द्वारा उन्होंने वेद, वेदांत आदि का ज्ञान प्राप्त कर लिया। इस अर्से में एकबार बाल घनश्याम अपने पिता धर्मदेव के साथ अद्वैतवादी विद्वानो की सभा में हिस्सा लेने काशी गए। यहाँ अद्वैतवादी पंडितों का बाल घनश्याम ने पराजय किया। बाल घनश्याम की विद्वता देख पंडित दिग्मूढ हो गए। एक नन्हें बालक में इतनी शक्ति! नितांत आश्चर्य!!
उनके बाल्यकाल का एक और प्रसंग हम देखें। घनश्याम आठदस वर्ष के थे, तब एक बार छपैया ग्राम में एक मछुआरे ने मीनसरोवर से मछलियों को पकडकर किनारे पर रखी। घनश्याम ने उसे दृष्टिमात्र से सजीवकर पुनः जल में डाल दिया; तथा मछुआरे को अहिंसा धर्म समजाते हुए कहा : ‘जिस प्रकार तुम्हें जीने का अधिकार है उसी प्रकार इन जीवों को भी है।’ नन्हें बालक का यह ऐश्वर्य देख मछुआरे ने अपना धंधा ही छोड दिया।
बाल्यकाल में ऐसी अद्भुत एवं चमत्कारी शक्ति का दर्शन किसी व्यक्तिविशेष पुरुष के जीवन में ही दृष्टिकृत होता है।
अब घनश्याम 11 वर्ष के हुए। 6 माह में ही उनके माता एवं पिता उभय अक्षरधामनिवासी हुए। तत्पश्चात् एक दिन घटना घटित हुई, कुस्ती लडने समय घनश्याम ने एक लडके को फेंक दिया। इस घटना से उनके बडेभैया को फरियाद मिली। बडेभैया रामप्रतापजी ने घनश्याम पर स्नेहल क्रोध किया। घनश्याम ने कहा : ‘बडेभैया अब आपको मेरे बारे में कभी कुछ भी सुनना नहीं पडेगा।’ रामप्रतापजी को घनश्याम के इस मार्मिक वचन के अर्थ की कल्पना उस वक्त नहीं हुई, किंतु घनश्याम को गृहत्याग का बहाना मिल गया।