३५. भगवान श्री स्वामिनारायण तथा उन्होंने स्थापित किए धर्म के विषय में उपरोक्त समग्र अध्ययन द्वारा निम्नलिखित हकीकत स्पष्ट होती है

(1) श्री स्वामिनारायण सर्वावतारी, क्षर-अक्षर से पर एवं सर्व कारण के कारण परब्रह्म परमात्मा हैं।

(2) श्री स्वामिनारायण स्वयं परात्पर परमात्मा होने के कारण सर्वोत्कृष्ट शांति-सुख की प्राप्ति हेतु, जगत के सर्व मनुष्य द्वारा उपासना करने योग्य हैं।

(3) अवतारों में अंश, कला, पूर्ण, परिपूर्ण जैसी तारतम्यता है, परंतु अवतार में अवतारी का आविर्भाव होता है; अतएव स्वाभाविक तौर से अवतार द्वारा आचरित चरित्र अवतारी के ही हैं। इस दृष्टि से शास्त्र में अवतार-अवतारी की अभेदता के वचन भी दृष्टिकृत होते हैं।

(4) जगत समक्ष आज व्यक्ति एवं समाज उभय का सर्वश्रेष्ठ श्रेय एवं प्रेय हो ऐसा सरल, परंतु पूर्ण मार्ग श्री स्वामिनारायणने प्रबोधित किया है।

(5) श्री स्वामिनारायण धर्म सर्वग्राही, सर्वजीवहितावह एवं विशाल सर्वदेशीय होने के कारण विश्वधर्म है ऐसा हर किसी को लगे बिना नहीं रहेगा।

(6) धर्म की व्याख्या विशाल दृष्टिबिंदु से होनी चाहिए। जो धर्म मनुष्य को वास्तविकरूप से मनुष्य बनाता है वही विश्वधर्म है। यह कथन प्रस्तुत धर्म के संदर्भ में अक्षरशः सत्य प्रमाणित होता है।

इस प्रकार, सर्वहितकर इस धर्म की विश्व में उत्तरोत्तर वृद्धि एवं विकास होता रहे ऐसी सर्वोपरि परात्पर परमात्मा श्री स्वामिनारायण महाप्रभु को प्रार्थना सह समाप्ति करता हूँ।