१. सर्वोपरि भगवान श्री स्वामिनारायण तथा विश्वधर्म

पूर्ण पुरुषोत्तम श्री स्वामिनारायण भगवान के अवतारी कार्य का मूल्यांकन करने के प्रयास को महासागर की तह से मोती निकालने के प्रयास के साथ तुलित किया जा सकता है। परब्रह्म परमात्मा का कोई क्या मूल्यांकन करे? उनकी क्या पहचान करवाये? वे स्वयं ही प्रकट होकर खुद की पहचान करवाते हैं।

भगवान श्री स्वामिनारायण परात्पर परब्रह्म परमात्मा हैं, इसका सबूत तो केवल स्वानुभव है। यह बुद्धि से नहीं, परंतु अनुभव के द्वारा ही ज्ञात हो ऐसा है; तथापि सर्वहितार्थ समकालीन समर्थ चिंतक, महापुरुषों के अभिप्राय, संतो एवं मुमुक्षुजनों को प्राप्त हुए प्रत्यक्ष अनुभव तथा शास्त्रों के आधारवचनों से उसका समर्थन करने का हम नम्र प्रयास करें; वैसे तो भगवान के चरित्रों में से यथार्थ सार तो उनके विशिष्ठ आवश्यकतावाले ही समझते हैं।

मान लें, श्री स्वामिनारायण को पलभर के लिए भगवान के तौर पर आरोपित ना भी करें फिर भी उनके चरित्रों का यदि निरीक्षण किया जाए तो उस पर से हमें प्रतीत होगा कि वे मनुष्य के जीवन को विशेष उन्नत तथा उपकारक बनाए ऐसा है।