६. दीक्षा

दीक्षा-प्रसंग भी नीलकंठवर्णी के अलौकिक प्रभाव के विषय में बहुत कुछ कह जाता है। विचरण करते-करते वर्णीवेश में नीलकंठ अंततः काठियावाड के मांगरोल बंदरगाह के पास लोज ग्राम में आ पहुँचे। वहाँ गाँव के बाहर स्थित ‘लोज की बावड़ी’ पर आकर बैठे। उस समय स्वामी रामानंदजी के सुखानंद नामक एक शिष्य साधु बावड़ी पर नहाने आए। सुखानंद तेजस्वी नीलकंठवर्णी को देखते ही विस्मित हो, आनंद का अनुभव करने लगे। दोनों में वार्तालाप हुआ। सुखानंद ने नीलकंठ को कहाँ से आए, कहाँ जाना है, आपके मातापिता कौन आदि प्रश्न पूछें, नीलकंठ ने उत्तर दिया : ‘मैं ब्रह्मपूर से आया हूँ तथा मुझे ब्रह्मपुर जाना है और जो वहाँ ले जाए वही मेरे सच्चे मातापिता।’ इस अर्थगंभीर उत्तर में नीलकंठ स्वयं कौन हैं यह ज्ञात करा दिया। एसा उत्तर सुन सुखानंद दंग रह गए तथा स्वयं जिस ज्ञान प्राप्ति के लिए इतने साल गुरु के पास रह तनतोड महेनत की थी वह ज्ञान का भंडार इस नन्हें से ब्रह्मचारी में भरा देख, उनके प्रति सुखानंद को आदरभाव हुआ। तत्पश्चात् सुखानंद नीलकंठ को स्वामी मुक्तानंदजी के पास ले आए। नीलकंठ ने रामानंदजी के पट्टशिष्य मुक्तानंदजी के समक्ष अपनी प्रभुदर्शन की पिपासा व्यक्त की। मुक्तानंदजी तथा नीलकंठ उभय ने भिन्न-भिन्न पत्र स्वामी रामानंदजी पर लिखे। रामानंदस्वामी स्वयं का स्थान संभाल सके एसे प्रतिभावंत शिष्य की प्रतिक्षा कर रहे थे। वे अनेक बार कहते : ‘मैं तो डुगडुगी बजानेवाला हूँ, पर वास्तविक खेल खेलनेवाला नट तो पीछे से आ रहा है।’ अतः उन खतों में, नीलकंठ के प्रभुदर्शन की आतुरता एवं उसके लिए उनकी साधना को देख स्वामी रामानंदजी बीच सभा में बोल उठे कि, ‘जिसकी मैं प्रतिक्षा कर रहा था वह आ पहूँचा है।’

इस वचन के विषय में एक बार स्वामी निष्कुलानंदजी ने रामानंदस्वामी से पूछा : ‘नए आनेवाले स्वामी रामदास जैसे हैं?’ स्वामी ने कहा : ‘रामदास तो क्या? उससे कहीं अधिक बडे!’ निष्कुलानंद ने आगे पूछा : ‘तो क्या मुक्तानंदस्वामी जैसे?’ स्वामी बोले : ‘उनसे भी अधिक बडे।’ अंततः निष्कुलानंदजीने पूछा : ‘आप जैसे?’ स्वामीने कहा : ‘हमारी भी उनके समक्ष क्या हैसियत? हमसे भी अधिक बडे।’ अनल्प समय के पश्चात निष्कुलानंदस्वामी को जब इस बात की प्रतीति हुई तब वे ऐसा बोले : ‘आज बात समझ में आई।’

रामानंदजी पर लिखे खत के उत्तर में स्वामी रामानंदजी ने नीलकंठ ब्रह्मचारी को लोज में रुकने को कहा तथा मुक्तानंदस्वामी की आज्ञा में रहकर साधुओं को हठयोग सिखाने को कहा, तदनुसार नीलकंठ मुक्तानंदस्वामी की आज्ञा में रहने लगे। वे गोबर एकत्रित करते; साधु के लिए भोजन तैयार करते; साधु की जगह को लीपते; बीमार साधु की सेवा करते। इस प्रकार सभी कार्य को संपन्न करते। उन्होंने किसी भी कार्य को तुच्छ नहीं माना। नीलकंठ के स्वरूप में विद्यमान सर्वोपरि महाप्रभु ने बताया कि, ‘स्वयं को तीनों लोक में कुछ भी करना शेष नहीं है, उसी प्रकार जिसकी प्राप्ति न हुई हो उसे प्राप्त करने की इच्छा भी नहीं तथापि स्वयं कर्म में प्रवृत्त रहेंगे; क्योंकि स्वयं जैसा आचरण करेंगे उसी प्रकार ही मनुष्य भी आचरण करेंगे।’

कुछ समय पश्चात् स्वामी रामानंदजी लोज के पास पिपलाणा गाँव में आ पहूँचे। नीलकंठवर्णी को वहाँ बुलवाया संवत 1857 की कार्तिक शुकल पक्ष की एकादशी के दिन नीलकंठवर्णी को उन्होंने दीक्षा दी तथा ‘सहजानंद’ ऐसा नाम रखा। यह नाम सार्थक ही था; क्योंकि जो भी जन उनके संपर्क में आते उन सभी को वे सहज में ही आनंदित करते तथा नीलकंठवर्णी में नारायण के सभी गुण तथा ऐश्वर्य देख रामानंदस्वामी ने उनका ‘नारायणमूनि’ ऐसा नाम भी रखा। इस प्रकार समस्त सद्गुणों से पूर्ण सहजानंद को सं. 1858 की कार्तिक माह की शुकल 11 प्रबोधिनी के दिन अपनी धर्मधूरा सौंप गुरुपद पर स्थापित किये। इस समय सहजानंदस्वामी की उम्र सिर्फ 21 वर्ष की थी।

तत्पश्चात् लगभग एक माह में स्वामी रामानंदजी विदेह हुए। श्री सहजानंदस्वामी की भावि अवतारी प्रवृत्ति की पूर्वभूमि ये समर्थ गुरु स्वामी रामानंदजीने तैयार की थी।

श्री स्वामिनारायण में विद्यमान भिन्न-भिन्न विशिष्ट गुणों के कारण सत्संग में उन्हें घनश्याम, नीलकंठवर्णी, सहजानंदस्वामी, नारायणमुनि, हरिकृष्ण, श्रीजीमहाराज, श्रीहरि आदि नामों से संबोधित करते।

दीक्षा दिन से श्री स्वामिनारायण के दिव्य जीवन का तृतीय तबक्का प्रारंभ होता है। इस काल दरमियान मनुष्य स्वरूप में छूपे हुए अवतारी प्रभु ने अपने प्रचंड प्रभाव, ऐश्वर्य तथा सामर्थी द्वारा अधर्म को उखाड, पृथ्वी पर सद्धर्म का स्थापन करने तथा विश्व में स्वयं के अवतारी स्वरूप की प्रतीति कराने के हेतु, मनुष्यशक्ति से असंभवित ऐसे अनेक विध विरल कार्य किये। जिसे स्थान संकोच के कारण हम संक्षिप्त में देखेंगे।

सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्र में महान परिवर्तन तथा श्री स्वामिनारायण की अवतारी शक्ति के दर्शन